जाति है कि जाती नही

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Slum in India
गरीबी और समस्याओं से हर जाति के लोग जूझते हैं

हाल ही में फिल्म आर्टिकल 15 पर स्वरा भास्कर का एक लेख Hindustan Times में प्रकाशित हुआ, जिसमें वह कहती हैं,

CASTE से अनभिज्ञ होना MODERN INDIA में अपने आप में एक ऐसी सहूलियत है, जिसका लाभ GENERAL ही ले सकते हैं।

Film आर्टिकल 15 की बात करते-करते महोदया जाति व्यवस्था की उस सच्चाई को खोलने का प्रयास करने लग जाती हैं, जो उन्होंने कभी जी ही नहीं है। उन्होंने Delhi में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की और आज Mumbai में काम कर रही हैं। जो व्यक्ति Delhi- MUmbai से कभी बाहर गया ही नहीं, उसे क्या पता होगा कि गाँव के खेतों में धान कैसे लगते हैं या गाँव के किसी old ruins में छुपते-छुपाते लोग Cards कैसे खेलते हैं। मुझे नहीं लगता कि उन्हें अपनी knowledge की पोटली दूसरे लोगों के सामने यह कहकर खोलनी चाहिए कि society ऐसा ही है।

जाति व्यवस्था से बाहर ही नहीं निकलना चाहते 


बदायूं बलात्कार और हत्याकांड ऐसा केस था, जिसने निर्भया कांड के बाद एक बार फिर सबको दहला दिया था। उसके साथ सहानभूति रखने वाले सिर्फ एक Caste, Religion से नहीं थे बल्कि वे लोग भी थे, जिन्हें High intellectual society, Marx के कथनों में शोषणकर्ता कहता है अर्थात Brahmin ।

इस Film के बहाने लोगों को अपनी भड़ास निकालने का मौका मिला गया। मेरे जैसे Brahmin इसलिए भड़ास निकाल रहे हैं, क्योंकि मेरा मानना है कि हमारी गलत छवि पेश की जा रही है और शोषित वर्ग इसलिए नाराज़ है, क्योंकि इस फिल्म में Main Character के तौर पर किसी ब्राह्मण को दिखाया गया है।

उनकी दलील है कि एक बार फिर उन्हें Brahmin के रहमो-करम पर justice के लिए अपनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। दरअसल, Society की problem ही यहीं से शुरू होती है कि हम अपनी Caste system में इतना रम चुके हैं कि उससे बाहर ही निकलना नहीं चाहते।

मेरी अपनी कोई बहन नहीं है लेकिन Delhi में एक बहन बनी जिसने मुझे राखी बांधी, वह बहन Muslim थी। BHU जिसे ऐसा मान लिया जाता है कि वह सिर्फ हिन्दुओं के पढ़ने की जगह है, वहां Kolkata से आया हुआ एक Muslim Friend मेरे साथ एक थाली में खाना खाता था। चाहे church हो या Gurudwara मुझे किसी भी religion को सम्मान देने में कभी हिचकिचाहट नहीं हुई।

शोषण के बदले शोषण कहां तक उचित?

ऐसा नहीं है कि caste system का effect सिर्फ कुछ sections को झेलना पड़ता है।

मुझे याद है BHU में एक टीचर ने class के सभी Brahmin students को internal में कम नंबर दिए थे। एक और professor थे, जिन्होंने मुझे Facebook पर blockकर दिया, क्योंकि मैं उनके Brahmin विरोधी शब्दों का विरोध कर देता था।

आज समाज के पढ़े-लिखे Professor इस दंश को बढ़ावा दे रहे हैं, क्योंकि उनके पुरखे शायद High class द्वारा शोषित हुए थे। उस शोषण का बदला आज high class के लोगोंं से लेना कहां तक उचित है? इस तरह तो society में कभी equality आ ही नहीं सकती है, क्योंकि जिस तरह उनके heart में एक शोषित होने का pain है, वह अब High class वाले के भी heart में है। हमें अपने ancestorsऔर poets को सिर्फ इसलिए नहीं पढ़ना चाहिए कि उन्होंने इस पर लिखा है, उनको ग्रहण भी करना चाहिए। किसी ने कहा भी है,

बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेई

Feeling of hatred कभी समरस नहीं होने देगा


मैं यह नहीं कह रहा किHigh class ने कोई अत्याचार नहीं किया लेकिन जब तक हम उन पुरानी चीज़ों को ढ़ोएंगे, तब तक हमारे मन में Feeling of hatred रहेगा और ये feelings हमें कभी समरस नहीं होने देगा।

वैसे Budaun के केस में Chargedऔर Victim दोनों एक जाति के थे ना कि ब्राहमण। यह सिर्फ इसलिए बता रहा हूं कि कई लोग आर्टिकल 15 के trailer को देखने के बाद Budaun case के आरोपियों को Brahmin समझ कर गलियां दे रहे हैं। मेरी नज़र में जाति की राजनीति करने वाले सभी नेता ब्राह्मणवाद विचारधारा से ग्रसित हैं, क्योंकि वह society में एकीकृत भाव का निर्माण होने ही नहीं देना चाहते। बाकि समझ अपनी-अपनी। गालियां बेशक देना लेकिन तर्क के साथ।

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